Tuesday, 6 September 2016

आज होश में आने को मत कहो

आज होश में आने को मत कहो,
जाम से नहीं आँखों से जो पी है
आज जगाओ मुझे नींद से ,
साकी के आगोश में जो ली है
लबों से मुस्कुराहट हटती नहीं ,
तुम्हारे लबों पर हँसी जो देख ली है
आशिक़ी की राह में अब डर नहीं ,
तुमने जो मेरी बाँह थाम ली है

आज कोई छुए मुझे ,
तेरे बदन का एहसास जो बाकी है
आज कुछ सुनना चाहूँ मैं,
तेरी बातों की कशिश जो बाकी है
जाड़ों की सर्द हवाओं में भी ,
तेरी सांसों की तपिश जो बाकी है
आज होश में आने को मत कहो ,
तेरी आँखों के जाम अभी बाकी है

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