Tuesday, 26 July 2016

बस जाओ इन आँखों में

दिल के हाथों मजबूर, आज फिर आया हूँ ।
भुलाना चाहा तुमको, पर भुला न पाया हूँ ॥
बस जाओ इन आँखों में, पलकों में सजा लूंगा ।
अब जो थामा हाथ तेरा, हाथ न छुड़ाऊंगा ॥

कहाँ कहाँ ढूंढा तुझे, पर मिली न तू कहीं ।
दिन रात दुआएँ की, पर लौट के आ गईं ॥
एक बार तू मिल जाये, हर सांस में समाऊंगा॥
अब जो थामा हाथ तेरा, हाथ न छुड़ाऊंगा ॥
दिल के हाथों मजबूर, आज फिर आया हूँ ।
भुलाना चाहा तुमको, पर भुला न पाया हूँ ॥
बस जाओ इन आँखों में, पलकों में सजा लूंगा ।
अब जो थामा हाथ तेरा, हाथ न छुड़ाऊंगा ॥

फूलों की खुशबू तुम, हम दिया और बाती हैं ।
कितना भुलाया तुझे, पर याद से न जाती हैं ॥
कितना सुकून तेरी बातों में, मिल कर बताऊंगा॥
अब जो थामा हाथ तेरा, हाथ न छुड़ाऊंगा ॥
बदिल के हाथों मजबूर, आज फिर आया हूँ ।
भुलाना चाहा तुमको, पर भुला न पाया हूँ ॥
बस जाओ इन आँखों में, पलकों में सजा लूंगा ।
अब जो थामा हाथ तेरा, हाथ न छुड़ाऊंगा ॥

वो रिम झिम बरसातें

बादल का गर्जना और दिल का यूं धड़कना,
वो लड़कपन की बातें याद आती हैं ।
वो रिम झिम बरसातें याद आती हैं ...............

चेहरे पर तुम्हारी बूंदों का यूं गिरना ।
और फिर उँगलियों से उन्हें यूं हटाना ॥
हथेलियों में भर पानी, नज़रों का यूं मिलाना।
और हथेलियां बंद कर, नज़रों का यूं चुराना ॥
वों प्यार भरी नज़रें याद आती हैं।
वो रिम झिम बरसातें याद आती हैं ॥
वो लड़कपन की बातें याद आती हैं ।
वो रिम झिम बरसातें याद आती हैं.................

पाँव से पाँव मिला कर, पानी में यूं चलना ।
और शरारत भरे मन का, फिर से यूं मचलना ॥
समय का बदलना और तुम्हारा दूर जाना ।
बीती बातों का दिल पर यूं दस्तक आना ॥
वों भीगी शामें याद आती हैं ।
वो रिम झिम बरसातें याद आती हैं ॥
वो लड़कपन की बातें याद आती हैं ।
वो रिम झिम बरसातें याद आती हैं ...............

Sunday, 17 July 2016

यारों की महफ़िल

चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है ।
तब कॉलेज की यादों से भरे बक्से से ,
वो किताब खुल जाती है ॥
जिसके पन्ने पलटते हुए,
जाम भरें जाते हैं।
और जहाँ दिल धड़कते थे ,
हर बार वहीँ साँसे थम जाती हैँ ॥
चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है ......................


एक और बस एक और,
जाम का दौर चलता है ।
वैसे तो पीता नही,
पर तेरे साथ जमता है ॥
शादी शुदा होने का एहसास  
भी भूल जाता है ।
जब कॉलेज की हसीन शामें,
याद आती हैँ ॥
चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है .......................


जब जाम ख़ाली होता हैं,
बीवी का औछल चेहरा नज़र आता हैं ।
और फिर हड़बड़ाहट में,
तारीफ़ों का पुल बन जाता है ।
जो बीवी भी सुन कर ,
सकपकाहट में रह जाती है ॥
चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है ......................


जहाँ पति बात नहीं करते,
वहां शेरो शायरी हो जाती हैं ।
एक साधारण सी बीवी  भी ,
हसीना बन जाती है ॥
जिससे झगड़ कर आये थे,
मिसालें मोहब्बत  बन जाती है ॥
चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है .....................