Thursday, 11 February 2016

तुम और मैं

तुम और मैं, मैं और तुम.............
आधे आधे से हम...................
महज़ब से परे, ख़्वाबों में जुड़ें........
आशियाना बुन रहे...................
जहाँ धरती आस्मां मिलें.............

एक सफर के दो राहीं हम............
एक धागे के दो किनारे................
उलझनों में उलझे ………............
कितने अलग फिर भी एक हैं हम.....
थामे हाथ चल रहे.....................
जहाँ धरती आस्मां मिलें...............

मोहब्बत करना सीखा तुम ही से……
गम में भी मुस्कुराना सीखा तुम ही से....
तुम संग जीना तुम संग मरना……….
ये अंदाज़ भी सीखा तुम ही से............
हर पल में खुशियां ढूँढ रहे................
जहाँ धरती आस्मां मिलें..................

तुम और मैं, मैं और तुम..................
आधे आधे से हम.........................
महज़ब से परे, ख़्वाबों में जुड़ें..............
आशियाना बुन रहे.........................
जहाँ धरती आस्मां मिलें....................

कितने मुख्तलिफ थे वह



कितने मुख्तलिफ थे दो मोती,
पिरोये मोह के धागे में........
हर पल एक सा दिखने की,
कोशिश कर रहे थे...............

मुख्तलिफ रंग-रूप,
मुख्तलिफ ख़याल................
दुनिया वाले बातें बनातें रहे,
और वे एक दूसरे के रंग में 
रंगे जा रहे थे........................

अठखेलियों में उनकी,
मधुर खनखनाहटें थी.......
लोगो ने सोचा मनमुटाव,
पर वह खनकनाहटों में 
ताल ढूंढ रहे थे.....................

मुख्तलिफ नूर हैं दोनों का,
मुख्तलिफ  शख्सियत………..
दुनिया वाले ढूंढे समता............
पर वह एक दूसरे के नूर में, 
रोशन हो उठे थे...................... 

लब्ज़ों की ज़रुरत नहीं अब 
नज़रों की ज़ुबान ही काफ़ी हैं .....
अनकहीं बातें भी हम 
बस यूं ही समझ लेते हैं .............

तुम और में,  
मुख़्तलिफ़ कहाँ अब .................
एक दूसरे के पूरक,
हम हो ही गए हैं  .....................