Friday, 15 January 2016

माँ.....

माँ
इक ऐसा शब्द
जिसे सुनते ही एहसास होता है....
ममतभरे स्पर्श का,
जो हर पल,
जो हर जगह,
एक साये के समान...
मेरी रक्षा करता है..........

एक ऐसा अनोखा प्रेम है माँ,
जो हर ख़ुशी में
मुस्कान बन मेरे लबो पर रहता है....
जो हर दुःख को
हवा बन उड़ा ले जाता है.......
जो हर कार्य को
करने की प्रेरणा देता है........
जो हर कदम पर
निर्णय लेने की शक्ति देता है......

पर आँखों से आसूं छलकते है,
और एक दर्द महसूस होता है .....
जब देखती हूँ
बिन माँ के बच्चों को,
कितना दुर्लभ है ये जीवन उनके लिए.....
जाने किस से बाटते है
वो अपना दर्द ............अपनी ख़ुशी
जो एक माँ ही समझ सकती है.............

फिर भी
देखो जाने कितने लोगों की माँ
जिंदगी के अंतिम क्षण
वयतीत कर रही है
तन्हाई  में ...............
क्यों  ???
क्या वो माँ ....माँ नहीं
क्या उसमे वो मातृत्व ....
या वो वात्सल्य नहीं
जो मेरी माँ मे है.....
या वो बेटे उस वात्सल्य के योग्य ही नहीं........