Sunday, 17 July 2016

यारों की महफ़िल

चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है ।
तब कॉलेज की यादों से भरे बक्से से ,
वो किताब खुल जाती है ॥
जिसके पन्ने पलटते हुए,
जाम भरें जाते हैं।
और जहाँ दिल धड़कते थे ,
हर बार वहीँ साँसे थम जाती हैँ ॥
चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है ......................


एक और बस एक और,
जाम का दौर चलता है ।
वैसे तो पीता नही,
पर तेरे साथ जमता है ॥
शादी शुदा होने का एहसास  
भी भूल जाता है ।
जब कॉलेज की हसीन शामें,
याद आती हैँ ॥
चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है .......................


जब जाम ख़ाली होता हैं,
बीवी का औछल चेहरा नज़र आता हैं ।
और फिर हड़बड़ाहट में,
तारीफ़ों का पुल बन जाता है ।
जो बीवी भी सुन कर ,
सकपकाहट में रह जाती है ॥
चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है ......................


जहाँ पति बात नहीं करते,
वहां शेरो शायरी हो जाती हैं ।
एक साधारण सी बीवी  भी ,
हसीना बन जाती है ॥
जिससे झगड़ कर आये थे,
मिसालें मोहब्बत  बन जाती है ॥
चार यार जब मिलते हैं,
तो महफ़िल मैख़ाना बन जाती है .....................

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