Thursday, 11 February 2016

कितने मुख्तलिफ थे वह



कितने मुख्तलिफ थे दो मोती,
पिरोये मोह के धागे में........
हर पल एक सा दिखने की,
कोशिश कर रहे थे...............

मुख्तलिफ रंग-रूप,
मुख्तलिफ ख़याल................
दुनिया वाले बातें बनातें रहे,
और वे एक दूसरे के रंग में 
रंगे जा रहे थे........................

अठखेलियों में उनकी,
मधुर खनखनाहटें थी.......
लोगो ने सोचा मनमुटाव,
पर वह खनकनाहटों में 
ताल ढूंढ रहे थे.....................

मुख्तलिफ नूर हैं दोनों का,
मुख्तलिफ  शख्सियत………..
दुनिया वाले ढूंढे समता............
पर वह एक दूसरे के नूर में, 
रोशन हो उठे थे...................... 

लब्ज़ों की ज़रुरत नहीं अब 
नज़रों की ज़ुबान ही काफ़ी हैं .....
अनकहीं बातें भी हम 
बस यूं ही समझ लेते हैं .............

तुम और में,  
मुख़्तलिफ़ कहाँ अब .................
एक दूसरे के पूरक,
हम हो ही गए हैं  .....................

3 comments:

  1. Bahut khoob likha hai वह दोनों एक दूसरे के नूर में, रोशन हो उठे

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